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ज़िंदगी से यूँ खेले!
अपनी वजहे-बरबादी सुनिये तो मज़े की है,ज़िंदगी से यूँ खेले जैसे दूसरे की है| जावेद अख़्तर
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इस गुल में कोई सोता क्या!
गली में शोर था मातम था और होता क्या,मैं घर में था मगर इस गुल में कोई सोता क्या| जावेद अख़्तर
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आवाज़ में छाले हैं!
इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं,होठों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं| जावेद अख़्तर
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मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए!
ऊँची इमारतों से मकां मेरा घिर गया,कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए| जावेद अख़्तर
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हाथ मेरा खुरदरा हुआ!
गिन गिन के सिक्के हाथ मेरा खुरदरा हुआ,जाती रही वो लम्स* की नर्मी, बुरा हुआ|(लम्स – स्पर्श) जावेद अख़्तर
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हार न अपनी मानूँगा मैं !
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों पर गीतों के राजकुंवर के नाम से जिनको जाना जाता था, ऐसे स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी जहां कवि सम्मेलनों में श्रोताओं का मन मोह लेते थे, वहीं हमारी हिन्दी फिल्मों में भी उन्होंने बहुत यादगार गीत…
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सफारी पहन के आते हैं!
इबादतों की हिफाज़त भी उनके जिम्मे है,जो मस्जिदों में सफारी पहन के आते हैं। राहत इन्दौरी
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मदारी पहन के आते हैं!
यही अकीक़ थे शाहों के ताज की जीनत,जो उँगलियों में मदारी पहन के आते हैं। राहत इन्दौरी