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सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा!
जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा, बिछड़ के उनसे सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा| कैफ़ी आज़मी
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पथ में किरण-छुरे!
आज एक बार फिर मैं अपने अग्रज और गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुँवर बेचैन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| डॉक्टर कुँवर बेचैन जी उन कवियों में शामिल हैं, जिनके गीतों को मैं कविता का शौक पैदा होने के बाद अक्सर गुनगुनाया करता था| मैंने पहले भी बेचैन जी की बहुत सी…