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इसी पंजाब में आ जाती है!
दिल की गलियों से तेरी याद निकलती ही नहीं,सोहनी फिर इसी पंजाब में आ जाती है| मुनव्वर राना
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अपने लहू से उसे ख़त लिखता हूँ!
रोज़ मैं अपने लहू से उसे ख़त लिखता हूँ,रोज़ उंगली मेरी तेज़ाब में आ जाती है| मुनव्वर राना
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माँ दुआ करती हुई!
जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है| मुनव्वर राना
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कहीं नहीं बचे!
आज एक बार फिर से मैं अपनी तरह के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और उनकी रचनाओं और अनूठे व्यक्तित्व के बारे में भी बातें की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र…
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सियासत से तबाही का!
बड़ा गहरा तअल्लुक़ है सियासत से तबाही का,कोई भी शहर जलता है तो दिल्ली मुस्कुराती है| मुनव्वर राना
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फिर भी मुस्कुराती है!
हमें ऐ ज़िन्दगी तुझ पर हमेशा रश्क आता है,मसायल से घिरी रहती है फिर भी मुस्कुराती है| मुनव्वर राना
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तितली मुस्कुराती है!
चमन में सुबह का मंज़र बड़ा दिलचस्प होता है,कली जब सो के उठती है तो तितली मुस्कुराती है| मुनव्वर राना
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घर आ के बेटी मुस्कुराती है!
तभी जाकर कहीं माँ-बाप को कुछ चैन पड़ता है,कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है| मुनव्वर राना
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तभी तो देख कर पोते को!
उछलते खेलते बचपन में बेटा ढूँढती होगी,तभी तो देख कर पोते को दादी मुस्कुराती है| मुनव्वर राना
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हिन्दी मुस्कुराती है!
लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है,मैं उर्दू में ग़ज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है| मुनव्वर राना