Category: Uncategorized
-
तिरे शहर में आते जाते!
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है ,उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते| राहत इन्दौरी
-
मिरी जान लुटाते जाते
हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते, जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते | राहत इन्दौरी
-
देशगान!
एक बार फिर से मैं आज स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| सर्वेसगवार जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि थे और प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन मण्डल में भी शामिल थे| यह रचना स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी के कविता संकलन ‘खूँटियों’ पर टंगे लोग’ से ली गई…
-
ज़ेहनों के वीराने लोग!
हम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैं, हमको दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोग| राही मासूम रज़ा
-
आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग!
फिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आई, फिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग| राही मासूम रज़ा
-
हँसते हैं जाने पहचाने लोग!
कौन ये जाने दीवाने पर कैसी सख़्त गुज़रती है, आपस में कुछ कह कर हँसते हैं जाने पहचाने लोग| राही मासूम रज़ा
-
हमको आते हैं समझाने लोग!
यादों से बचना मुश्किल है उनको कैसे समझाएँ, हिज्र के इस सहरा तक हमको आते हैं समझाने लोग| राही मासूम रज़ा
-
रोज़ कहें अफ़्साने लोग!
हम क्या जानें क़िस्सा क्या है हम ठहरे दीवाने लोग, उस बस्ती के बाज़ारों में रोज़ कहें अफ़्साने लोग| राही मासूम रज़ा
-
अन्वेषण!
आज फिर से मैं श्री रामनरेश त्रिपाठी जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| त्रिपाठी जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और स्वाधीनता सेनानी भी थे| उनकी कुछ कविताओं का प्रार्थना के रूप में प्रयोग किया जाता है| जैसे- ‘हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए, शीघ्र सारे दुर्गुणों से दूर हमको कीजिए’ अथवा ‘मैं…
-
हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है!
अगर तबस्सुम-ए-ग़ुंचा की बात उड़ी थी यूँही, हज़ार रंग में डूबी हुई हवा क्यूँ है| राही मासूम रज़ा