Category: Uncategorized
-
गालियां खा के बे मज़ा न हुआ!
कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रकीब,गालियां खा के बे मज़ा न हुआ| मिर्ज़ा ग़ालिब
-
भूल गलती- मुक्तिबोध
आज गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक प्रसिद्ध रचना शेयर कर रहा हूँ| मुक्तिबोध जी एक क्रांतिकारी कवि थे, अपने समय से आगे की कविताएं लिखी थीं उन्होंने| लीजिए आज प्रस्तुत है गजानन माधव मुक्तिबोध जी की यह कविता जो उनके संकलन ‘चाँद का मुंह टेढ़ा है’ में शामिल थी – भूल-ग़लतीआज बैठी है ज़िरहबख्तर…
-
जलती है सहर होते तक!
ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़मर्ग इलाज, शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक | मिर्ज़ा ग़ालिब
-
तुम को ख़बर होते तक!
हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन, ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होते तक| मिर्ज़ा ग़ालिब
-
हम पे भी भारी हैं सहर होते तक!
ता-क़यामत शब-ए-फ़ुर्क़त में गुज़र जाएगी उम्र, सात दिन हम पे भी भारी हैं सहर होते तक| मिर्ज़ा ग़ालिब
-
ख़ून-ए-जिगर होते तक!
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब, दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होते तक| मिर्ज़ा ग़ालिब
-
चाहिए इक उम्र असर होते तक!
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक, कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक| मिर्ज़ा ग़ालिब
-
अडिग- रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…