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क़तरा इन आँखों से जुदा होता!
रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी, क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता| चकबस्त बृज नारायण
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कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता!
हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर, अगर उनमें से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता| चकबस्त बृज नारायण
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कोसों तलक जंगल हरा होता!
बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता, जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता| चकबस्त बृज नारायण
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ग़म होता न जीने का मज़ा होता!
अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता, न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता| चकबस्त बृज नारायण
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शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना क्या है!
चमकता है शहीदों का लहू पर्दे में क़ुदरत के, शफ़क़ का हुस्न क्या है शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना क्या है| चकबस्त बृज नारायण
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वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादत से!
नया बिस्मिल हूँ मैं वाक़िफ़ नहीं रस्म-ए-शहादत से, बता दे तू ही ऐ ज़ालिम तड़पने की अदा क्या है| चकबस्त बृज नारायण
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ख़ुदा जाने ख़ता क्या है!
गुनह-गारों में शामिल हैं गुनाहों से नहीं वाक़िफ़, सज़ा को जानते हैं हम ख़ुदा जाने ख़ता क्या है| चकबस्त बृज नारायण
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देखें सितम की इंतिहा क्या है!
उन्हें ये फ़िक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है, हमें ये शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या है| चकबस्त बृज नारायण
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स्त्री!
आज हिन्दी के एक वरिष्ठ कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में उन्होंने स्त्री को लेकर कुछ अलग प्रकार की अभिव्यक्ति की है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता – एक हँसी का नाम है स्त्रीस्त्री एक रुलाई का नाम…