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हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगी!
बदन पर नई फ़स्ल आने लगी, हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगी| आदिल मंसूरी
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बिखर रहे हैं पुरानी किताब के!
किस तरह जम्अ’ कीजिए अब अपने आप को, काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के| आदिल मंसूरी
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रवाँ-दवाँ हैं चमकते सराब के!
बस तिश्नगी की आँख से देखा करो उन्हें, दरिया रवाँ-दवाँ हैं चमकते सराब* के|*मृगतृष्णा आदिल मंसूरी
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आँख में जाले थे ख़्वाब के!
सोए तो दिल में एक जहाँ जागने लगा, जागे तो अपनी आँख में जाले थे ख़्वाब के| आदिल मंसूरी
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नक़्श उठ आए गुलाब के!
फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया, उस गुल-बदन पे नक़्श उठ आए गुलाब के| आदिल मंसूरी
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क़तील हैं उसी ख़ाना-ख़राब के!
वो जो तुम्हारे हाथ से आकर निकल गया, हम भी क़तील हैं उसी ख़ाना-ख़राब के| आदिल मंसूरी
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प्यास के क्षण!
आज एक बार मैं वरिष्ठ कवि, गीतकार एवं संपादक श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, राही जी का काव्य पाठ सुनना भी एक अलग प्रकार का अनुभव रहा है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह…