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पूछा हाल कुछ ऐसी अदा के साथ!
ऐसा लगा ग़रीबी की रेखा से हूँ बुलंद, पूछा किसी ने हाल कुछ ऐसी अदा के साथ| कैफ़ी आज़मी
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जाग उट्ठे हैं आवाज़-ए-पा के साथ!
इक्कीसवीं सदी की तरफ़ हम चले तो हैं, फ़ित्ने भी जाग उट्ठे हैं आवाज़-ए-पा के साथ| कैफ़ी आज़मी
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मगर नाख़ुदा के साथ!
गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो, डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ| कैफ़ी आज़मी
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प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ!
की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ, थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ| कैफ़ी आज़मी
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रात में सदियाँ गुज़र गईं!
पाया भी उनको खो भी दिया चुप भी हो रहे, इक मुख़्तसर सी रात में सदियाँ गुज़र गईं| कैफ़ी आज़मी
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चाँदनी रातें बिखर गईं!
पैमाना टूटने का कोई ग़म नहीं मुझे, ग़म है तो ये कि चाँदनी रातें बिखर गईं| कैफ़ी आज़मी
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सब मिरे दिल में उतर गईं!
अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ, वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं| कैफ़ी आज़मी
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बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं!
दीवाना पूछता है ये लहरों से बार बार, कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं| कैफ़ी आज़मी
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जो घटाएँ गुज़र गईं!
क्या जाने किसकी प्यास बुझाने किधर गईं, इस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गईं| कैफ़ी आज़मी