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वो काँच का पैकर है!
यूँ देखते रहना उसे अच्छा नहीं ‘मोहसिन’, वो काँच का पैकर है तो पत्थर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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देखेंगी पलट कर तिरी आँखें!
मैं संग-सिफ़त एक ही रस्ते में खड़ा हूँ, शायद मुझे देखेंगी पलट कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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ताज़ा ग़ज़ल और भी कह लूँ!
मुमकिन हो तो इक ताज़ा ग़ज़ल और भी कह लूँ, फिर ओढ़ न लें ख़्वाब की चादर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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शाम का मंज़र तिरी आँखें!
अब तक मिरी यादों से मिटाए नहीं मिटता, भीगी हुई इक शाम का मंज़र तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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दिल में उतर कर तिरी आँखें!
बोझल नज़र आती हैं ब-ज़ाहिर मुझे लेकिन, खुलती हैं बहुत दिल में उतर कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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लुटाती रहीं गौहर तेरी आँखें!
ख़ाली जो हुई शाम-ए-ग़रीबाँ की हथेली, क्या क्या न लुटाती रहीं गौहर तेरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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मुझसे बिछड़ कर तिरी आँखें!
फिर कौन भला दाद-ए-तबस्सुम उन्हें देगा, रोएँगी बहुत मुझसे बिछड़ कर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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समुंदर तिरी आँखें!
भड़काएँ मिरी प्यास को अक्सर तिरी आँखें, सहरा मिरा चेहरा है समुंदर तिरी आँखें| मोहसिन नक़वी
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ऋतुराज इक पल का!
आज एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय कवि, वरिष्ठ गीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, आज का यह नवगीत भी कुछ अलग किस्म का है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – राजमिस्त्री से…
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इश्क़ को आज़मा के देख लिया!
‘फ़ैज़’ तकमील-ए-ग़म भी हो न सकी, इश्क़ को आज़मा के देख लिया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़