Category: Uncategorized
-
किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं!
हम हैं वो टूटी हुई कश्तियों वाले ‘ताबिश,’ जो किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
-
ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं!
उनके भी क़त्ल का इल्ज़ाम हमारे सर है, जो हमें ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
-
ध्यान में लाते हुए मर जाते हैं!
किस तरह लोग चले जाते हैं उठ कर चुप-चाप, हम तो ये ध्यान में लाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
-
तिरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं!
घर पहुँचता है कोई और हमारे जैसा, हम तिरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
-
निभाते हुए मर जाते हैं!
हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस, जो तअ’ल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
-
प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं!
दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं, हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं| अब्बास ताबिश
-
युवा जंगल!
आधुनिक हिन्दी कवि और भारत सरकार की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में किसी समय अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| मैंने पहले भी अशोक वाजपेयी जी की कुछ कविताएं शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता –…
-
आलम-ए-ज़िंदाँ तुम से ज़ियादा!
ज़ंजीर ओ दीवार ही देखी तुम ने तो ‘मजरूह’ मगर हम, कूचा कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी
-
जश्न-ए-चराग़ाँ तुम से ज़ियादा!
जाओ तुम अपने बाम की ख़ातिर सारी लवें शम्ओं की कतर लो, ज़ख़्म के मेहर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चराग़ाँ तुम से ज़ियादा| मजरूह सुल्तानपुरी