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मुझे क़र्ज़-दार करती रही!
ये ज़िंदगी जो मुझे क़र्ज़-दार करती रही, कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ| राहत इन्दौरी
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चारों तरफ़ भीड़ गूँगे बहरों की!
है मेरे चारों तरफ़ भीड़ गूँगे बहरों की, किसे ख़तीब बनाऊँ किसे ख़िताब करूँ| राहत इन्दौरी
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हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूँ!
उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है, बहुत हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूँ| राहत इन्दौरी
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ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ!
मुझे बुतों से इजाज़त अगर कभी मिल जाए, तो शहर-भर के ख़ुदाओं को बे-नक़ाब करूँ| राहत इन्दौरी
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चराग़ों को आफ़्ताब करूँ!
अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ, मैं चाहता था चराग़ों को आफ़्ताब करूँ| राहत इन्दौरी
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मैं सबके सामने रोने लगा था!
मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया, मैं सबके सामने रोने लगा था| राहत इन्दौरी
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चुराता हूँ अब आँखें आइनों से!
चुराता हूँ अब आँखें आइनों से, ख़ुदा का सामना होने लगा था| राहत इन्दौरी