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तख़्लीक़-ए-जुनूँ रुकी नहीं है!
वीरानों से आ रही है आवाज़, तख़्लीक़-ए-जुनूँ रुकी नहीं है| अली सरदार जाफ़री
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एक सूनी नाव!
आज एक बार फिर मैं अपने समय के लोकप्रिय कवि स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक छोटी सी परंतु अति सुंदर कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की अनेक कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की यह कविता – एक सूनी नावतट पर लौट…
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सारे रास्तों की याद बचपन में!
लिपट जाती है सारे रास्तों की याद बचपन में, जिधर से भी गुज़रता हूँ मैं रस्ता याद रहता है| मुनव्वर राना
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परिंदा तो वही होता है-
अगर सोने के पिंजड़े में भी रहता है तो क़ैदी है, परिंदा तो वही होता है जो आज़ाद रहता है| मुनव्वर राना
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इसलिए बरबाद रहता है!
भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है, मोहब्बत करने वाला इसलिए बरबाद रहता है| मुनव्वर राना
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इतवार होना चाहिए!
अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे, इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए| मुनव्वर राना
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घर-बार होना चाहिए!
ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें, टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए| मुनव्वर राना