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ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा!
मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर, तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी
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पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा!
न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा, हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी
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ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ!
इक न इक रोज़ कहीं ढूँढ ही लूँगा तुझको, ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ| राहत इन्दौरी
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कमज़ोर शाख़ें कि हिला भी न सकूँ!
फल तो सब मेरे दरख़्तों के पके हैं लेकिन, इतनी कमज़ोर हैं शाख़ें कि हिला भी न सकूँ| राहत इन्दौरी
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बुलाया है कि जा भी न सकूँ!
मिरी ग़ैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे, उसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ| राहत इन्दौरी
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ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ!
फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया, ये तिरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ| राहत इन्दौरी
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ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ!
अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ, ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ| राहत इन्दौरी
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हम न होंगे!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक और सुंदर कविता शेयर कर रहा हूँ| अशोक वाजपेयी जी की कुछ कविताएं मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ और उनके बारे में अपनी जानकारी भी शेयर कर चुका हूँ|लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की एक…
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क़लंदर हो गदा हो नहीं सकता!
दरबार में जाना मिरा दुश्वार बहुत है, जो शख़्स क़लंदर हो गदा हो नहीं सकता| मुनव्वर राना