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तुझसे छूट के तबीअ’त कहाँ कहाँ!
बेताबी-ओ-सुकूँ की हुईं मंज़िलें तमाम, बहलाएँ तुझसे छूट के तबीअ’त कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मुझको मोहब्बत कहाँ कहाँ!
आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ, उफ़ ले गई है मुझको मोहब्बत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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मूल्य दे सुख के क्षणों का!
आज एक बार फिर मैं प्रसिद्ध आधुनिक हिन्दी कवि, सीनियर बच्चन जी की एक सुंदर रचना शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों की शान हुआ करते थे, उनको सुनने के लिए श्रोतागण दूर-दूर से कवि सम्मेलनों में आते थे| मैंने पहले भी बच्चन जी के बहुत से…