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आँखें बोलेंगी!
आज एक और सुंदर कविता स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और उनके बारे में काफी लिखा भी है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक और सुंदर कविता – जीभ की ज़रूरत नहीं है क्योंकि कहकर…
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अब ‘मुल्ला’ को कहना आ गया!
लब पे नग़्मा और रुख़ पर इक तबस्सुम की नक़ाब, अपने दिल का दर्द अब ‘मुल्ला’ को कहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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आ गया काँटों में रहना आ गया!
एक ना-शुकरे चमन को रंग-ओ-बू देता रहा, आ गया हाँ आ गया काँटों में रहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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मुझको रंज सहना आ गया!
पी के आँसू सी के लब बैठा हूँ यूँ इस बज़्म में, दर-हक़ीक़त जैसे मुझको रंज सहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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मोती का गहना आ गया!
तुझको अपना ही लिया आख़िर निगार-ए-इश्क़ ने, ऐ उरूस-ए-चश्म ले मोती का गहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला