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बाद-ए-सबा हो नहीं सकता!
इस ख़ाक-ए-बदन को कभी पहुँचा दे वहाँ भी, क्या इतना करम बाद-ए-सबा हो नहीं सकता| मुनव्वर राना
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मुझे तूने मुसीबत से निकाला!
ऐ मौत मुझे तूने मुसीबत से निकाला, सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता| मुनव्वर राना
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इस शहर में क्या हो नहीं सकता!
बस तू मिरी आवाज़ से आवाज़ मिला दे, फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता| मुनव्वर राना
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इतना तो दिया हो नहीं सकता!
दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँखें, रौशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता| मुनव्वर राना
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ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता!
मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता, अब इससे ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता| मुनव्वर राना
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तुलना!
लंबे समय के बाद आज मैं स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक और सुंदर कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी आपातकाल में प्रकाशित अपने ग़ज़ल संग्रह ‘साए में धूप’ के कारण बहुत प्रसिद्ध हो गए थे, मैंने शुरू में उनकी ग़ज़लें शेयर की थीं लेकिन कई बार से मैं उनकी अन्य कविताएं शेयर कर…
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जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए!
जल उठे बज़्म-ए-ग़ैर के दर-ओ-बाम, जब भी हम ख़ानुमाँ-ख़राब आए| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़