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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 14th Oct 2022

    ख़फ़ा मेरी नज़र शाम के बाद!

    दिन तिरे हिज्र में कट जाता है जैसे-तैसे, मुझसे रहती है ख़फ़ा मेरी नज़र शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 14th Oct 2022

    जो लौट आया हो घर शाम के बाद!

    उससे दरयाफ़्त न करना कभी दिन के हालात, सुब्ह का भूला जो लौट आया हो घर शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 14th Oct 2022

    तेज धूप में!

    आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि, जो कवि सम्मेलनों में मुख्यतः हास्य-व्यंग्य की कविताओं के लिए जाने जाते थे- स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की रचना शेयर कर रहा हूँ| उनकी कुछ रचनाएं जैसे- ‘अमौस्या का मेला’ अथवा ‘मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना’ बहुत सफल रचनाएं थीं| मेरी आयोजनों में आमंत्रित करने का कारण…

  • 13th Oct 2022

    खिलते हैं मगर शाम के बाद!

    तेज़ हो जाता है ख़ुशबू का सफ़र शाम के बाद, फूल शहरों में भी खिलते हैं मगर शाम के बाद| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Oct 2022

    दहलीज़ पे ऐ ‘नूर’ उजाला है बहुत!

    कोई आया है ज़रूर और यहाँ ठहरा भी है, घर की दहलीज़ पे ऐ ‘नूर’ उजाला है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Oct 2022

    ख़ुद को तराशा है बहुत!

    मिरे हाथों की लकीरों के इज़ाफ़े हैं गवाह, मैंने पत्थर की तरह ख़ुद को तराशा है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Oct 2022

    कभी क़तरा है बहुत!

    तिश्नगी के भी मक़ामात हैं क्या क्या यानी, कभी दरिया नहीं काफ़ी कभी क़तरा है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Oct 2022

    देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत!

    रात हो दिन हो कि ग़फ़लत हो कि बेदारी हो, उसको देखा तो नहीं है उसे सोचा है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Oct 2022

    बिछड़ जाने का धड़का है बहुत!

    इक ग़ज़ल उस पे लिखूँ दिल का तक़ाज़ा है बहुत, इन दिनों ख़ुद से बिछड़ जाने का धड़का है बहुत| कृष्ण बिहारी ‘नूर’

  • 13th Oct 2022

    वक़्त की मीनार पर!

    आज मैं हिन्दी नवगीत के प्रतिष्ठापक और एक श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी की एक रचना, शेयर कर रहा हूँ| हिन्दी नवगीत के पुरोधा के रूप में इनका बहुत सम्मान है|लीजिए, प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभूनाथ सिंह जी का यह गीत- मैं तुम्हारे साथ हूँहर मोड़ पर संग-संग मुड़ा हूँ। तुम जहाँ भी…

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