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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Oct 2022

    झिलमिलाती रही रात भर!

    गाह जलती हुई गाह बुझती हुई, शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 23rd Oct 2022

    चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर!

    आपकी याद आती रही रात भर,चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

  • 23rd Oct 2022

    अपने आप में!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अपनी किस्म के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की कविताओं को पढ़ना अपने आप में एक अलग ही किस्म के अनुभव से गुजरना होता है| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने…

  • 22nd Oct 2022

    करते हैं आज़ादाना हम!

    क़ैद होकर और भी ज़िंदाँ में उड़ता है ख़याल, रक़्स ज़ंजीरों में भी करते हैं आज़ादाना हम| अली सरदार जाफ़री

  • 22nd Oct 2022

    मेहर-ओ-माह को पैमाना हम!

    या जगा देते हैं ज़र्रों के दिलों में मय-कदे, या बना लेते हैं मेहर-ओ-माह को पैमाना हम| अली सरदार जाफ़री

  • 22nd Oct 2022

    इस अहद का अफ़्साना हम!

    मिटते मिटते दे गए हम ज़िंदगी को रंग-ओ-नूर, रफ़्ता रफ़्ता बन गए इस अहद का अफ़्साना हम| अली सरदार जाफ़री

  • 22nd Oct 2022

    बा-शौकत-ए-शाहाना हम!

    राह में फ़ौजों के पहरे सर पे तलवारों की छाँव, आए हैं ज़िंदाँ में भी बा-शौकत-ए-शाहाना हम| अली सरदार जाफ़री

  • 22nd Oct 2022

    लिए फिरते हैं ज़िंदाँ-ख़ाना हम!

    क्या बला जब्र-ए-असीरी है कि आज़ादी में भी, दोश पर अपने लिए फिरते हैं ज़िंदाँ-ख़ाना हम| अली सरदार जाफ़री

  • 22nd Oct 2022

    गुल-ओ-गुलज़ार हर वीराना हम!

    ख़ून-ए-दिल से चश्म-ए-तर तक चश्म-ए-तर से ता-ब-ख़ाक, कर गए आख़िर गुल-ओ-गुलज़ार हर वीराना हम| अली सरदार जाफ़री

  • 22nd Oct 2022

    गर्दिश-ए-पैमाना हम!

    मस्ती-ए-रिंदाना हम सैराबी-ए-मय-ख़ाना हम, गर्दिश-ए-तक़दीर से हैं गर्दिश-ए-पैमाना हम| अली सरदार जाफ़री

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