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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Apr 2023

    हम आबाद करते हैं!

    मोहब्बत के चमन में मजमा-ए-अहबाब रहता है, नई जन्नत इसी दुनिया में हम आबाद करते हैं| बृज नारायण चकबस्त

  • 29th Apr 2023

    हवा में उड़ के सैर!

    हवा में उड़ के सैर-ए-आलम-ए-ईजाद करते हैं, फ़रिश्ते दंग हैं वो काम आदम-ज़ाद करते हैं| बृज नारायण चकबस्त

  • 29th Apr 2023

    बरबाद करते हैं!

    नए झगड़े निराली काविशें ईजाद करते हैं, वतन की आबरू अहल-ए-वतन बरबाद करते हैं| बृज नारायण चकबस्त

  • 29th Apr 2023

    दिल का ये आलम है!

    ख़ुदा को भूलकर इंसान के दिल का ये आलम है, ये आईना अगर सूरत-नुमा होता तो क्या होता| बृज नारायण चकबस्त

  • 29th Apr 2023

    इन आँखों से जुदा होता

    रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी, क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता| बृज नारायण चकबस्त

  • 29th Apr 2023

    बुतों की बेवफ़ाई पर!

    हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर, अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता| बृज नारायण चकबस्त

  • 29th Apr 2023

    जंगल हरा होता!

    बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता, जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता| बृज नारायण चकबस्त

  • 29th Apr 2023

    न जीने का मज़ा होता!

    अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता, न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता| चकबस्त बृज नारायण

  • 29th Apr 2023

    अहिंसा!

    आज एक बार फिर मैं जनकवि बाबा नागार्जुन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में अहिंसा को एक भिखारिन के रूप में दर्शाया गया है| बाबा नागार्जुन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है जनकवि बाबा नागार्जुन जी की यह कविता  – 105 साल…

  • 28th Apr 2023

    कोई मेहरबाँ क्यूँ हो!

    उम्मीदें सारी दुनिया से ‘वसीम’ और ख़ुद में ऐसे ग़म, किसी पे कुछ न ज़ाहिर हो तो कोई मेहरबाँ क्यूँ हो|    वसीम बरेलवी

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