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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 10th Nov 2022

    चिड़ियों को आज़ाद किया!

    खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से, रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया| निदा फ़ाज़ली

  • 10th Nov 2022

    खोल के फिर आबाद किया!

    आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया, बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया| निदा फ़ाज़ली

  • 10th Nov 2022

    माँ!

    आज मैं श्री रामदरश मिश्र जी की माँ के बारे में लिखी गई एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस छोटी सी कविता ने मुझे काफी प्रभावित किया है| मैंने श्री रामदरश मिश्र जी की कुछ कविताएं पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता – चेहरे परकुछ…

  • 9th Nov 2022

    जो चाहते हैं समुंदर-कशी के साथ!

    क़तरे वो कुछ भी पाएँ ये मुमकिन नहीं ‘वसीम’, बढ़ना जो चाहते हैं समुंदर-कशी के साथ| वसीम बरेलवी

  • 9th Nov 2022

    बहुत दिन किसी के साथ!

    दुनिया को बेवफ़ाई का इल्ज़ाम कौन दे, अपनी ही निभ सकी न बहुत दिन किसी के साथ| वसीम बरेलवी

  • 9th Nov 2022

    गुज़ारी किसी के साथ!

    किस काम की रही ये दिखावे की ज़िंदगी, वादे किए किसी से गुज़ारी किसी के साथ| वसीम बरेलवी

  • 9th Nov 2022

    दुश्मनी भी नहीं थी किसी के साथ!

    दुनिया मिरे ख़िलाफ़ खड़ी कैसे हो गई, मेरी तो दुश्मनी भी नहीं थी किसी के साथ| वसीम बरेलवी

  • 9th Nov 2022

    चला हूँ किसी रौशनी के साथ!

    तेरा ख़याल, तेरी तलब तेरी आरज़ू, मैं उम्र भर चला हूँ किसी रौशनी के साथ| वसीम बरेलवी

  • 9th Nov 2022

    क़ुबूल मिरी हर कमी के साथ!

    शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ, कीजे मुझे क़ुबूल मिरी हर कमी के साथ| वसीम बरेलवी

  • 9th Nov 2022

    मज़ाक़ हुआ रौशनी के साथ!

    सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ, कितना बड़ा मज़ाक़ हुआ रौशनी के साथ| वसीम बरेलवी

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