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वो पहली सी रौशनी!
शम्ओं‘ में अब नहीं है वो पहली सी रौशनी, क्या वाक़ई वो अंजुमन-आरा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई
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सहारा है इन दिनों!
ये दिल ज़रा सा दिल तिरी यादों में खो गया, ज़र्रे को आँधियों का सहारा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई
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दरिया की मौज मौज!
हर सैल-ए-अश्क साहिल-ए-तस्कीं है आज-कल, दरिया की मौज मौज किनारा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई
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वही चारा है इन दिनों!
दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों, पहले जो दर्द था वही चारा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई
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यह मधुमय देश हमारा!
आज मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| प्रसाद जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह कविता – अरुण यह मधुमय देश हमारा।जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।। सरल…