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हाहाकार / हुंकार!
आज एक बार फिर मैं राष्ट्रकवि और ओज के प्रमुख कवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| दिनकर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता – दिव की ज्वलित शिखा सी उड़ तुम…
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मीठे लोग रसीले लोग!
ज़िद्दी वहशी अल्लहड़ चंचल मीठे लोग रसीले लोग, होंट उन के ग़ज़लों के मिसरे आँखों में अफ़्साने थे| इब्न-ए-इंशा
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सब जाने-पहचाने थे!
रात के ख़्वाब सुनाएँ किस को रात के ख़्वाब सुहाने थे, धुँदले धुँदले चेहरे थे पर सब जाने-पहचाने थे| इब्न-ए-इंशा
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सुब्ह सहर से पहले!
चाँद से आँख मिली जी का उजाला जागा, हमको सौ बार हुई सुब्ह सहर से पहले| इब्न-ए-इंशा
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तिरे दर से पहले!
हम किसी दर पे न ठिटके न कहीं दस्तक दी, सैकड़ों दर थे मिरी जाँ तिरे दर से पहले| इब्न-ए-इंशा
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रात ढलती ही नहीं!
जी बहलता ही नहीं अब कोई साअ‘त कोई पल, रात ढलती ही नहीं चार पहर से पहले| इब्न-ए-इंशा
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हिज्र का ग़म भी देखा!
इश्क़ पहले भी किया हिज्र का ग़म भी देखा, इतने तड़पे हैं न घबराए न तरसे पहले| इब्न-ए-इंशा
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चल दिए उठ के!
चल दिए उठ के सू-ए-शहर-ए-वफ़ा कू-ए-हबीब, पूछ लेना था किसी ख़ाक-बसर* से पहले| *शोकमग्न इब्न-ए-इंशा
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इश्क़ में घर से पहले!
अपने हमराह जो आते हो इधर से पहले, दश्त पड़ता है मियाँ इश्क़ में घर से पहले| इब्न-ए-इंशा
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अतिथि से!
आज मैं छायावाद युग की एक प्रमुख कवियित्री स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| महादेवी जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय महादेवी वर्मा जी की यह कविता – बनबाला के गीतों सानिर्जन में बिखरा है मधुमास,इन कुंजों में खोज रहा हैसूना…