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ये बला की मेहरबानी!
ये इनायतें ग़ज़ब की ये बला की मेहरबानी, मेरी ख़ैरियत भी पूछी किसी और की ज़बानी| नज़ीर बनारसी
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प्रिये तुम्हारी इन आँखों में!
आज मैं अपने समय में हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और गीतकार रहे तथा काव्य-मंचों की शोभा बढ़ाने वाले स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी का यह गीत– प्रिये तुम्हारी…
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नासमझ हवा पूछ रही है इक पता!
शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पता, मौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी| परवीन शाकिर
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रूह के और जाल भी!
उसके ही बाज़ुओं में और उसको ही सोचते रहे, जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी| परवीन शाकिर
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छुप गया अपने ग़मों का हाल भी!
उसकी सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं, उसकी हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी| परवीन शाकिर
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यूँ गिरा भूल गया सवाल भी!
मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर, हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी| परवीन शाकिर
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दिल का अजीब हाल था!
उसको न पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था, अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी| परवीन शाकिर
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दिल तो चमक सकेगा क्या!
दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लें, शीशा-गिरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी| परवीन शाकिर
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गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी!
सबसे नज़र बचा के वो मुझको कुछ ऐसे देखता, एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी| परवीन शाकिर
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उस पे तिरा जमाल भी!
बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की, चाँद भी ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी| परवीन शाकिर