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हर सदा पर बुलाती रही रात भर!
जो न आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर, हर सदा पर बुलाती रही रात भर| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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‘फ़ैज़’ ग़ज़ल इब्तिदा करो!
भीगी है रात ‘फ़ैज़’ ग़ज़ल इब्तिदा करो, वक़्त-ए-सरोद दर्द का हंगाम ही तो है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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एक रोज़ करेगी नज़र वफ़ा!
आख़िर तो एक रोज़ करेगी नज़र वफ़ा, वो यार-ए-ख़ुश-ख़िसाल सर-ए-बाम ही तो है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है!
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है, लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ये हर्फ़ तिरा नाम ही तो है!
दिल मुद्दई के हर्फ़-ए-मलामत से शाद है, ऐ जान-ए-जाँ ये हर्फ़ तिरा नाम ही तो है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है!
हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है, दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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काफ़ी दिन हो गये!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में उन्होंने मौत से साक्षात्कार को दर्शाने का प्रयास किया है| कभी ऐसा भी लगता है कि मौत हमारे पास से गुज़र गई है| लीजिए आज प्रस्तुत है भवानी…