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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 16th Jun 2023

    इख़्तियार भी रख!

    ख़ुदा के हाथ में मत सौंप सारे कामों को, बदलते वक़्त पे कुछ अपना इख़्तियार भी रख| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Jun 2023

    यक़ीन चाँद पे!

    यक़ीन चाँद पे सूरज में ए‘तिबार भी रख, मगर निगाह में थोड़ा सा इंतिज़ार भी रख| निदा फ़ाज़ली

  • 16th Jun 2023

    ख़ार निकल गए!

    मिरे काम आ गईं आख़िरश यही काविशें यही गर्दिशें, बढ़ीं इस क़दर मिरी मंज़िलें कि क़दम के ख़ार निकल गए| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 16th Jun 2023

    शबाब गर्मी-ए-बज़्म है

    तुझे चश्म-ए-मस्त पता भी है कि शबाब गर्मी-ए-बज़्म है, तुझे चश्म-ए-मस्त ख़बर भी है कि सब आबगीने पिघल गए| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 16th Jun 2023

    जहाँ के तौर बदल गए!

    वही आस्ताँ है वही जबीं वही अश्क है वही आस्तीं, दिल-ए-ज़ार तू भी बदल कहीं कि जहाँ के तौर बदल गए| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 16th Jun 2023

    नग़्मा में आ गई!

    वही बात जो वो न कह सके मिरे शेर-ओ-नग़्मा में आ गई, वही लब न मैं जिन्हें छू सका क़दह-ए-शराब में ढल गए| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 16th Jun 2023

    हैं सबसे मधुर वो गीत!

    आज एक बार फिर से मैं भारतीय फिल्मों पर अपने गीतों के माध्यम से अमिट छाप छोड़ने वाले जनकवि स्वर्गीय शैलेंद्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ|  शैलेंद्र जी की बहुत सी रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शैलेंद्र जी की यह रचना  – हैं सबसे मधुर…

  • 15th Jun 2023

    शबों के राज़ मचल गए

    वो लजाए मेरे सवाल पर कि उठा सके न झुका के सर, उड़ी ज़ुल्फ़ चेहरे पे इस तरह कि शबों के राज़ मचल गए| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th Jun 2023

    चराग़ राह में जल गए!

    मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए, तिरा हाथ हाथ में आ गया कि चराग़ राह में जल गए| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 15th Jun 2023

    उट्ठा है तिरी बज़्म से!

    वही ‘मजरूह’ वही शाइर-ए-आवारा-मिज़ाज, कोई उट्ठा है तिरी बज़्म से दिल-गीर न देख| मजरूह सुल्तानपुरी

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