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दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे!
इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करना, घर की दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे| निदा फ़ाज़ली
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तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे!
घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे, हर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे| निदा फ़ाज़ली
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कुंठा!
स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मन में पल रही कुंठा को इस कविता में एक पौराणिक चरित्र के माध्यम से चित्रित किया गया है| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह कविता – मेरी कुंठारेशम के कीड़ों-सीताने-बाने बुनती,तड़प तड़पकरबाहर आने को सिर धुनती,स्वर सेशब्दों सेभावों सेऔ’ वीणा…
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ज़ख़्म दिए हैं किसी को फूल दिए!
किसी को ज़ख़्म दिए हैं किसी को फूल दिए, बुरी हो चाहे भली हो मगर ख़बर में रहो| राहत इन्दौरी
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आग लगी हो तो अपने घर में रहो!
जला न लो कहीं हमदर्दियों में अपना वजूद, गली में आग लगी हो तो अपने घर में रहो| राहत इन्दौरी
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कभी दिल कभी नज़र में रहो!
कभी दिमाग़ कभी दिल कभी नज़र में रहो, ये सब तुम्हारे ही घर हैं किसी भी घर में रहो| राहत इन्दौरी
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किताबों की तरह पढ़ने लगे!
एक इक पल को किताबों की तरह पढ़ने लगे, उम्र भर जो न किया हम ने वो अब करते हैं| राहत इन्दौरी
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मगर बात ही कब करते हैं!
ख़ुद को पत्थर सा बना रक्खा है कुछ लोगों ने, बोल सकते हैं मगर बात ही कब करते हैं| राहत इन्दौरी
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उसे धुन है मसीहाई की!
देखिए जिसको उसे धुन है मसीहाई की, आज कल शहर के बीमार मतब* करते हैं|*इलाज राहत इन्दौरी