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डाली पे लौट भी जाते!
परिंदे होते तो डाली पे लौट भी जाते, हमें न याद दिलाओ कि शाम हो गई है| राजेश रेड्डी
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ख़मोशी ही मेरा कलाम हो गई है!
किसी से गुफ़्तुगू करने को जी नहीं करता, मिरी ख़मोशी ही मेरा कलाम हो गई है| राजेश रेड्डी
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साँस लेने की ज़हमत तमाम हो गई!
जब आई मौत तो राहत की साँस ली हमने, कि साँस लेने की ज़हमत तमाम हो गई है| राजेश रेड्डी
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ज़िंदगी तो कोई इंतिक़ाम हो गई है!
हर एक साँस ही हम पर हराम हो गई है, ये ज़िंदगी तो कोई इंतिक़ाम हो गई है| राजेश रेड्डी
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चंदन वन डूब गया!
आज एक बार फिर मैं अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनके कुछ गीत शेयर कर रहा था, वैसे तो किशन जी ने इतने सुंदर गीत लिखे हैं कि लगता है कि उनको शेयर करता ही जाऊं। लेकिन फिलहाल इस…
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इतनी तबीअ’त भरी न थी!
दुनिया से ऐ दिल इतनी तबीअ’त भरी न थी, तेरे लिए उठाई नदामत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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उस अदा की शिकायत कहाँ कहाँ!
बेगानगी पर उसकी ज़माने से एहतिराज़, दर-पर्दा उस अदा की शिकायत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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इश्क़ की है कोई इंतिहा कि ये!
नैरंग-ए-इश्क़ की है कोई इंतिहा कि ये, ये ग़म कहाँ कहाँ ये मसर्रत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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अब तो हैं परछाइयाँ तिरी!
दिल के उफ़क़ तक अब तो हैं परछाइयाँ तिरी, ले जाए अब तो देख ये वहशत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी
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छोड़ दिया दिल का साथ भी!
राह-ए-तलब में छोड़ दिया दिल का साथ भी, फिरते लिए हुए ये मुसीबत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी