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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Dec 2022

    डाली पे लौट भी जाते!

    परिंदे होते तो डाली पे लौट भी जाते, हमें न याद दिलाओ कि शाम हो गई है| राजेश रेड्डी

  • 17th Dec 2022

    ख़मोशी ही मेरा कलाम हो गई है!

    किसी से गुफ़्तुगू करने को जी नहीं करता, मिरी ख़मोशी ही मेरा कलाम हो गई है| राजेश रेड्डी

  • 17th Dec 2022

    साँस लेने की ज़हमत तमाम हो गई!

    जब आई मौत तो राहत की साँस ली हमने, कि साँस लेने की ज़हमत तमाम हो गई है| राजेश रेड्डी

  • 17th Dec 2022

    ज़िंदगी तो कोई इंतिक़ाम हो गई है!

    हर एक साँस ही हम पर हराम हो गई है, ये ज़िंदगी तो कोई इंतिक़ाम हो गई है| राजेश रेड्डी

  • 17th Dec 2022

    चंदन वन डूब गया!

    आज एक बार फिर मैं अपनी एक पुरानी ब्लॉग पोस्ट शेयर कर रहा हूँ| प्रसिद्ध गीत कवि स्व. श्री किशन सरोज जी का स्मरण करते हुए उनके कुछ गीत शेयर कर रहा था, वैसे तो किशन जी ने इतने सुंदर गीत लिखे हैं कि लगता है कि उनको शेयर करता ही जाऊं। लेकिन फिलहाल इस…

  • 16th Dec 2022

    इतनी तबीअ’त भरी न थी!

    दुनिया से ऐ दिल इतनी तबीअ’त भरी न थी, तेरे लिए उठाई नदामत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 16th Dec 2022

    उस अदा की शिकायत कहाँ कहाँ!

    बेगानगी पर उसकी ज़माने से एहतिराज़, दर-पर्दा उस अदा की शिकायत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 16th Dec 2022

    इश्क़ की है कोई इंतिहा कि ये!

    नैरंग-ए-इश्क़ की है कोई इंतिहा कि ये, ये ग़म कहाँ कहाँ ये मसर्रत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 16th Dec 2022

    अब तो हैं परछाइयाँ तिरी!

    दिल के उफ़क़ तक अब तो हैं परछाइयाँ तिरी, ले जाए अब तो देख ये वहशत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 16th Dec 2022

    छोड़ दिया दिल का साथ भी!

    राह-ए-तलब में छोड़ दिया दिल का साथ भी, फिरते लिए हुए ये मुसीबत कहाँ कहाँ| फ़िराक़ गोरखपुरी

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