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ख़ुद ज़हर-ए-तमन्ना की तरफ़!
हम भी अमृत के तलबगार रहे हैं लेकिन, हाथ बढ़ जाते हैं ख़ुद ज़हर-ए-तमन्ना की तरफ़| राही मासूम रज़ा
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ज़िन्दगी के अलामात हैं अभी!
सीने में ज़िन्दगी के अलामात हैं अभी,गो ज़िन्दगी की कोई ज़रूरत नहीं रही| दुष्यंत कुमार
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सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग!
हिम्मत से सच कहो तो बुरा मानते हैं लोग,रो—रो के बात कहने की आदत नहीं रही| दुष्यंत कुमार
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वैसी अदावत नहीं रही!
कुछ दोस्तों से वैसे मरासिम नहीं रहे,कुछ दुश्मनों से वैसी अदावत नहीं रही| दुष्यंत कुमार
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मुल्क में हमारी हक़ूमत नहीं रही!
हमको पता नहीं था हमें अब पता चला,इस मुल्क में हमारी हक़ूमत नहीं रही| दुष्यंत कुमार
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दुष्ट डाकिया-रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही!
हमने तमाम उम्र अकेले सफ़र किया,हम पर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही| दुष्यंत कुमार
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रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही!
कैसी मशालें ले के चले तीरगी में आप,जो रोशनी थी वो भी सलामत नहीं रही| दुष्यंत कुमार