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तुझ पे मरता हूँ तिरे!
तुझ पे मरता हूँ तिरे सर की क़सम खाता हूँ,ग़ैर ने आज ठिकाने की क़सम खाई है| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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डर यही है कि कहीं!
डर यही है कि कहीं ख़ुद से न धोका खा जाए,जिस ने धोके में न आने की क़सम खाई है| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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इन्क़िलाबात के शोले!
इन्क़िलाबात के शोले भी कहीं बुझते हैं,आप ने आग बुझाने की क़सम खाई है| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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चंदन वन डूब गया!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक श्रेष्ठ गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ- वह देखो कुहरे में, चंदन वन डूब गया। आशा है आपको यह पसंद आएगा, धन्यवाद। *****
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हम हैं काव्यलोक के वासी!
प्रस्तुत है आज का गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- हम हैं काव्यलोक के वासीगीतों में रोते-हंसते हैं।जब-जब मन व्याकुल होता हैहम उसकी लगाम कसते हैं। जो पाषाण हृदय प्राणी हैंउनकी अपनी आन-बान है,सदा चाहते वंदित होनाउनसे ही चलता जहान है,यह आधुनिक जगत है भाईपग-पग पर विषधर डसते हैं। पत्थर बनकर पूजित होंगेमोम बने तो…
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आशियानों को जलाने!
बाग़बानों ने ये एहसास हुआ है मुझ को,आशियानों को जलाने की क़सम खाई है| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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तुम ने जी भर के!
तुम ने जी भर के सताने की क़सम खाई है, मैं ने आँसू न बहाने की क़सम खाई है| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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मैं भी हूँ इसी दश्त का!
मैं राह-नुमाओं में नहीं मान मिरी बात,मैं भी हूँ इसी दश्त का सौदाई इधर आ| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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सुनता हूँ कि तुझको!
सुनता हूँ कि तुझ को भी ज़माने से गिला है,मुझ को भी ये दुनिया नहीं रास आई इधर आ| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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मिल बाँट के रो लें !
मुझ को भी ये लम्हों का सफ़र चाट रहा है,मिल बाँट के रो लें ऐ मिरे भाई इधर आ| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी