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वाक़िफ़-ए-हाल कर दिया!
मेरे लबों पे मोहर थी पर मेरे शीशा-रू ने तो, शहर के शहर को मिरा वाक़िफ़-ए-हाल कर दिया| परवीन शाकिर
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इश्क़ के इस सफ़र ने तो!
चलने का हौसला नहीं रुकना मुहाल कर दिया, इश्क़ के इस सफ़र ने तो मुझ को निढाल कर दिया| परवीन शाकिर
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पेड़ कटते वक़्त!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के सृजनधर्मी नवगीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| श्री बुदधिनाथ जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए अब प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह सुंदर नवगीत – शब्द मुझसे पूछ बैठा आज तुम मेरी कीमत समझते…
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ठिकाने के दिन आ रहे हैं!
चलो ‘फ़ैज़’ फिर से कहीं दिल लगाएँ, सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं!
टपकने लगी उन निगाहों से मस्ती, निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं!
अभी से दिल ओ जाँ सर-ए-राह रख दो, कि लुटने लुटाने के दिन आ रहे हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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वो याद भी कम आते हैं!
और कुछ देर न गुज़रे शब-ए-फ़ुर्क़त से कहो, दिल भी कम दुखता है वो याद भी कम आते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़