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सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया!
गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया, होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया| निदा फ़ाज़ली
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गीत गुणनफल के!
स्वर्गीय रमेश रंजक जी अत्यंत समर्थ नवगीतकार थे जिन्होंने कुछ कालजयी नवगीत लिखे हैं| मैंने पहले भी रंजक जी की कुछ रचनाएं शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक और नवगीत – गीत गुणनफल केसम्बोधन कल केडूब गए धार में फिसल के मछली थी बाँह की प्रियाक्यों मन को…
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गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आए कोई!
कोई आहट कोई आवाज़ कोई चाप नहीं, दिल की गलियाँ बड़ी सुनसान हैं आए कोई| परवीन शाकिर
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उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई!
अब तो इस राह से वो शख़्स गुज़रता भी नहीं, अब किस उम्मीद पे दरवाज़े से झाँके कोई| परवीन शाकिर
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फूलों को किताबों में न रक्खे कोई!
मैं तो उस दिन से हिरासाँ हूँ कि जब हुक्म मिले, ख़ुश्क फूलों को किताबों में न रक्खे कोई| परवीन शाकिर
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न कभी टूट के बिखरे कोई!
जिस तरह ख़्वाब मिरे हो गए रेज़ा रेज़ा, उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई| परवीन शाकिर
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तिरा नाम न पढ़ ले कोई!
काँप उठती हूँ मैं ये सोच के तन्हाई में, मेरे चेहरे पे तिरा नाम न पढ़ ले कोई| परवीन शाकिर
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बिखरने से न रोके कोई!
अक्स-ए-ख़ुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई, और बिखर जाऊँ तो मुझको न समेटे कोई| परवीन शाकिर
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क्या मुझको बहाल कर दिया!
मुद्दतों बा’द उसने आज मुझसे कोई गिला किया, मंसब-ए-दिलबरी पे क्या मुझको बहाल कर दिया| परवीन शाकिर
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ख़्वाब ओ ख़याल कर दिया!
चेहरा ओ नाम एक साथ आज न याद आ सके, वक़्त ने किस शबीह को ख़्वाब ओ ख़याल कर दिया| परवीन शाकिर