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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Sep 2023

    मैं भी था तन्हाई भी!

    काँच के पीछे चाँद भी था और काँच के ऊपर काई भी, तीनों थे हम वो भी थे और मैं भी था तन्हाई भी| गुलज़ार

  • 5th Sep 2023

    कैसे मिलाता है मुझे!

    तेरा मुंकिर* नहीं ऐ वक़्त मगर देखना है, बिछड़े लोगों से कहाँ कैसे मिलाता है मुझे| *न मानने वाला शहरयार

  • 5th Sep 2023

    हौल सा आता है मुझे!

    मेरी इन आँखों को ख़्वाबों से पशेमानी है, नींद के नाम से जो हौल सा आता है मुझे| शहरयार

  • 5th Sep 2023

    कौन बुलाता है मुझे!

    रात का वक़्त है सूरज है मिरा राह-नुमा, देर से दूर से ये कौन बुलाता है मुझे| शहरयार

  • 5th Sep 2023

    क्या नज़र आता है मुझे

    दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे, फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे| शहरयार

  • 5th Sep 2023

    आषाढ़ का पहला दिवस!

    आज फिर से मैं, अपने समय में मंचों के विशिष्ट कवि रहे स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की ये पंक्तियाँ हमारे पूर्व प्रधानमंत्री और स्वयं अच्छे कवि रहे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी अक्सर दोहराते थे- हार में या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं, संघर्ष…

  • 4th Sep 2023

    मिरी वहशत का सबब!

    मुझ से क्या पूछ रहे हो मिरी वहशत का सबब, बू-ए-आवारा से पूछो कि भटकती क्यूँ है| शहरयार

  • 4th Sep 2023

    बात खटकती क्यूँ है!

    तुझ से मिल कर भी न तन्हाई मिटेगी मेरी, दिल में रह रह के यही बात खटकती क्यूँ है| शहरयार

  • 4th Sep 2023

    बेगाना समझती क्यूँ है!

    मुझको अपना न कहा इस का गिला तुझ से नहीं, इसका शिकवा है कि बेगाना समझती क्यूँ है| शहरयार

  • 4th Sep 2023

    रंग बदलती क्यूँ है!

    जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है, ज़िंदगी रोज़ नए रंग बदलती क्यूँ है| शहरयार

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