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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th Sep 2023

    और बेहतर देखिए!

    अक़्ल ये कहती दुनिया मिलती है बाज़ार में, दिल मगर ये कहता है कुछ और बेहतर देखिए| जावेद अख़्तर

  • 7th Sep 2023

    अंदर कि बाहर देखिए!

    ज़ेहन-ए-इंसानी इधर ‘आफ़ाक़ की वुसअत’* उधर, एक मंज़र है यहाँ अंदर कि बाहर देखिए| *दुनिया का फैलाव जावेद अख़्तर

  • 7th Sep 2023

    अब मैं कोई और हूँ!

    छोड़ कर जिस को गए थे आप कोई और था, अब मैं कोई और हूँ वापस तो आकर देखिए| जावेद अख़्तर

  • 7th Sep 2023

    पानी के अंदर देखिए!

    पुर-सुकूँ लगती है कितनी झील के पानी पे बत, पैरों की बे-ताबियाँ पानी के अंदर देखिए| *बतख जावेद अख़्तर

  • 7th Sep 2023

    कल जहाँ दीवार थी!

    कल जहाँ दीवार थी है आज इक दर देखिए, क्या समाई थी भला दीवाने के सर देखिए| जावेद अख़्तर

  • 7th Sep 2023

    आँखों में रेत प्यास!

    आज मैं अपने एक अग्रज और हिन्दी नवगीत को प्रतिष्ठा दिलाने में एक अग्रणी भूमिका निभाने वाले स्वर्गीय देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय इन्द्र जी से मुझे बहुत स्नेह प्राप्त हुआ था और मैं सामान्यतः जो मेरे अधिक निकट रहे हैं उनकी रचनाएं शेयर नहीं करता हूँ| लीजिए…

  • 6th Sep 2023

    धरा सा रहता है!

    सर में जुम्बिश ख़याल की भी नहीं, ज़ानुओं पर धरा सा रहता है| गुलज़ार

  • 6th Sep 2023

    ज़रा सा रहता है!

    एक पल देख लूँ तो उठता हूँ, जल गया घर ज़रा सा रहता है| गुलज़ार 

  • 6th Sep 2023

    मंज़र हरा सा रहता है

    काई सी जम गई है आँखों पर, सारा मंज़र हरा सा रहता है| गुलज़ार 

  • 6th Sep 2023

    डरा सा रहता है!

    सहमा सहमा डरा सा रहता है, जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है| गुलज़ार 

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