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जो रुस्वा न हो ज़माने में!
वो कोई रंग है जो उड़ न जाए ऐ गुल-ए-तर, वो कोई बू है जो रुस्वा न हो ज़माने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दर्द भरा था मिरे फ़साने में!
‘फ़िराक़’ दौड़ गई रूह सी ज़माने में, कहाँ का दर्द भरा था मिरे फ़साने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
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नाम उछलता रहा ज़माने में!
कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में, जुनूँ का नाम उछलता रहा ज़माने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
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गोरी बैठी छत्त पर!
हास्य व्यंग्य में छंदबद्ध कविता के दिग्गज कवि स्वर्गीय ओमप्रकाश आदित्य जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| आदित्य जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| इस रचना का प्रसंग है कि एक नवयुवती छज्जे पर उदास बैठी है। उसकी मुख-मुद्रा देखकर लग रहा है कि जैसे वह छत से…