-
प्यार को मायूब समझते होंगे!
भूल कर अपना ज़माना ये ज़माने वाले, आज के प्यार को मायूब* समझते होंगे|*ग़लत बशीर बद्र
-
मोहब्बत की ज़बाँ ख़ुशबू है!
मैं समझता था मोहब्बत की ज़बाँ ख़ुशबू है, फूल से लोग उसे ख़ूब समझते होंगे| बशीर बद्र
-
मिरा महबूब समझते होंगे!
इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी, लोग तुझको मिरा महबूब समझते होंगे| बशीर बद्र
-
कहते हैं किसे ख़ूब समझते होंगे!
वो ग़ज़ल वालों का उस्लूब* समझते होंगे, चाँद कहते हैं किसे ख़ूब समझते होंगे|*Style बशीर बद्र
-
घट!
आज हिन्दी साहित्य के एक विराट व्यक्तित्व स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में एक तरह से एक मटका अपनी मालकिन- पनिहारिन से अपने मनोभाव व्यक्त कर रहा है| अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है अज्ञेय जी…
-
ख़्वाब ये देखा है क़ैद-ख़ाने में!
हमीं हैं गुल हमीं बुलबुल हमीं हवा-ए-चमन, ‘फ़िराक़’ ख़्वाब ये देखा है क़ैद-ख़ाने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
दास्ताँ थी निहाँ तेरे आँख उठाने में!
उसी की शरह है ये उठते दर्द का आलम, जो दास्ताँ थी निहाँ तेरे आँख उठाने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
जान पड़ गई हसरत भरे फ़साने में!
किसी की हालत-ए-दिल सुन के उठ गईं आँखें, कि जान पड़ गई हसरत भरे फ़साने में| फ़िराक़ गोरखपुरी
-
हासिल यही है जलने का!
बयान-ए-शम्अ है हासिल यही है जलने का, फ़ना की कैफ़ियतें देख झिलमिलाने में| फ़िराक़ गोरखपुरी