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पैकर अच्छा लगता है!
चाहत हो या पूजा सब के अपने अपने साँचे हैं, जो मौत में ढल जाए वो पैकर अच्छा लगता है| निदा फ़ाज़ली
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वो अच्छा लगता है!
मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं, जिससे अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है| निदा फ़ाज़ली
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घर अच्छा लगता है!
नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है, कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है| निदा फ़ाज़ली
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चिंगारी बनकर उड़ री!
आज एक बार फिर से मैं किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले एक प्रमुख कवि स्वर्गीय गोपाल सिंह ‘नेपाली’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह ‘नेपाली’ जी की यह कविता –…
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मगर फिर सँभल गया!
मुद्दत के बा‘द आज उसे देख कर ‘मुनीर’, इक बार दिल तो धड़का मगर फिर सँभल गया| मुनीर नियाज़ी
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मंज़र बदल गया!
थी शाम ज़हर-ए-रंग में डूबी हुई खड़ी, फिर इक ज़रा सी देर में मंज़र बदल गया| मुनीर नियाज़ी
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दफ़ीने देख लेता हूँ!
खड़ा हूँ यूँ किसी ख़ाली क़िले के सेहन-ए-वीराँ में, कि जैसे मैं ज़मीनों में दफ़ीने* देख लेता हूँ| *गड़े , दफनाए हुए, खजाने मुनीर नियाज़ी
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छींटे देख लेता हूँ!
छुपाते हैं बहुत वो गर्मी-ए-दिल को मगर मैं भी, गुल-ए-रुख़ पर उड़ी रंगत के छींटे देख लेता हूँ| मुनीर नियाज़ी