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न अपनी ही वफ़ा याद!
दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद, अब मुझको नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद| जिगर मुरादाबादी
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नक़्श-ए-क़दम नहीं!
अब इश्क़ उस मक़ाम पे है जुस्तुजू-नवर्द, साया नहीं जहाँ कोई नक़्श-ए-क़दम नहीं| जिगर मुरादाबादी
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इनायत से कम नहीं!
शिकवा तो एक छेड़ है लेकिन हक़ीक़तन, तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं| जिगर मुरादाबादी
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आँखें भी नम नहीं!
या रब हुजूम-ए-दर्द को दे और वुसअ‘तें, दामन तो क्या अभी मिरी आँखें भी नम नहीं| जिगर मुरादाबादी
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ये नेमत भी कम नहीं!
बे-फ़ाएदा अलम नहीं बे-कार ग़म नहीं, तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये नेमत भी कम नहीं| जिगर मुरादाबादी
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दिमाग़ी गुहान्धकार का ओरांगउटांग!
लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है हिन्दी साहित्य में अपनी तरह के अनूठे कवि स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध जी की एक कविता| मुक्तिबोध जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज फिर से प्रस्तुत है स्वर्गीय मुक्तिबोधजी की यह कविता – स्वप्न के भीतर स्वप्न,विचारधारा के भीतर औरएक अन्यसघन…