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सुनाई है वहीं से हमने!
जिस जगह पहले-पहल नाम तिरा आता है, दास्ताँ अपनी सुनाई है वहीं से हमने| जाँ निसार अख़्तर
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दीवाना बने फिरते थे!
वो भी क्या दिन थे कि दीवाना बने फिरते थे, सुन लिया था तिरे बारे में कहीं से हमने| जाँ निसार अख़्तर
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शिकनों को चुना!
हौसला खो न दिया तेरी नहीं से हमने, कितनी शिकनों को चुना तेरी जबीं से हमने| जाँ निसार अख़्तर
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खंडहर के प्रति!
आज एक बार फिर से प्रस्तुत कर रहा हूँ , छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता, जिन्होंने हमें ‘राम की शक्ति पूजा’ जैसी कुछ अमर रचनाएं हमें दी हैं| निराला जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी…
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करता नहीं हूँ मैं!
उन कामों की बनाता हूँ फ़िहरिस्त बार बार, जो काम मुझको करने हैं करता नहीं हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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सँवरता नहीं हूँ मैं!
पहचान ही न पाऊँ ख़ुद अपने ही अक्स को, इतना भी आइने में सँवरता नहीं हूँ मैं| राजेश रेड्डी
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नसीबों की तरह तू!
मुँह फेर के जाना है तुझे जा तिरी मर्ज़ी, मत रूठ मगर मुझ से नसीबों की तरह तू| राजेश रेड्डी
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उमीदों की तरह तू!
चाहा था बहुत मैंने भुला दूँ तुझे लेकिन, जाता ही नहीं दिल से उमीदों की तरह तू| राजेश रेड्डी
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मिरी नींदों की तरह तू!
सुख-चैन मिरा लूटने वाले आ किसी दिन, मुझको भी चुरा ले मिरी नींदों की तरह तू| राजेश रेड्डी