-
फ़ासला लगे है मुझे!
अब एक आध क़दम का हिसाब क्या रखिए, अभी तलक तो वही फ़ासला लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
-
ख़ौफ़ सा लगे है मुझे!
न जाने वक़्त की रफ़्तार क्या दिखाती है, कभी कभी तो बड़ा ख़ौफ़ सा लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
-
पहचानता लगे है मुझे!
मैं सोचता था कि लौटूँगा अजनबी की तरह, ये मेरा गाँव तो पहचानता लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
-
तो बुरा लगे है मुझे!
मैं जब भी उसके ख़यालों में खो सा जाता हूँ, वो ख़ुद भी बात करे तो बुरा लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
-
झाँकता लगे है मुझे
मैं सो भी जाऊँ तो क्या मेरी बंद आँखों में, तमाम रात कोई झाँकता लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
-
कभी रात भीग जाती है
जो आँसुओं में कभी रात भीग जाती है, बहुत क़रीब वो आवाज़-ए-पा लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
-
बद-दुआ लगे है मुझे!
हर एक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे, ये ज़िंदगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे| जाँ निसार अख़्तर
-
एक चाय की चुस्की!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि एवं गीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मालवीय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की यह रचना – एक चाय की चुस्कीएक कहकहाअपना तो इतना सामान ही रहा । चुभन…
-
इतने यक़ीं से हमने!
कुछ समझ कर ही ख़ुदा तुझ को कहा है वर्ना, कौन सी बात कही इतने यक़ीं से हमने| जाँ निसार अख़्तर
-
प्यार लेकिन किया है!
यूँ तो एहसान हसीनों के उठाए हैं बहुत, प्यार लेकिन जो किया है तो तुम्हीं से हमने| जाँ निसार अख़्तर