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इक शाम के साए तले!
इक शाम के साए तले बैठे रहे वो देर तक, आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं| बशीर बद्र
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लिखा कुछ भी नहीं!
जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाए रात भर, भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं| बशीर बद्र
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तेरी ख़ता कुछ भी नहीं
सोचा तुझे देखा तुझे चाहा तुझे पूजा तुझे, मेरी ख़ता मेरी वफ़ा तेरी ख़ता कुछ भी नहीं| बशीर बद्र
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उर पर पत्थर धर दो!
एक बार फिर से मैं आज हिन्दी गीत जगत के विराट व्यक्तित्व स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| एक समय था जब बच्चन जी ने गीत के श्रोताओं को दीवाना बना दिया था और दूर-दूर से लोग उनका काव्य पाठ सुनने के लिए जाते थे| बच्चन जी की कुछ रचनाएं…
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वैसी तो दुनिया नहीं!
जैसी होनी चाहिए थी वैसी तो दुनिया नहीं, दुनिया-दारी भी ज़रूरत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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आदमिय्यत है चलो!
भूल थी अपनी फ़रिश्ता आदमी में ढूँडना, आदमी में आदमिय्यत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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लिबासों की तरह!
मैले हो जाते हैं रिश्ते भी लिबासों की तरह, दोस्ती हर दिन की मेहनत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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होगा कहीं उसकी तरह
वो नहीं तो कोई तो होगा कहीं उसकी तरह, जिस्म में जब तक हरारत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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बेवफ़ा वो हैं तो क्या!
हम कहाँ के देवता हैं बेवफ़ा वो हैं तो क्या, घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली