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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Jun 2026

    सूरज!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की रचना शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की यह कविता – साधो तुमको विश्वास नहीं होगारोज़ सवेरे अभी भी सूरज निकलता हैगोल-गोल, लाल-लालउसकी बड़ी-बड़ी आँखें हैंफूले-फूले गालऔर भोला-सा मुँहमेरे…

  • 17th Jun 2026

    अगर महकाओ तो क्या!

    कोई रंग तो दो मिरे चेहरे को,फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या| उबैदुल्लाह अलीम

  • 17th Jun 2026

    कुछ दिन तो बसो!

    कुछ दिन तो बसो मिरी आँखों में,फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या| उबैदुल्लाह अलीम

  • 17th Jun 2026

    अगर चल सको साथ चलो तुम-3

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज प्रस्तुत है मेरे स्वर में स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी के गीत का अगला भाग – मुझे ओस की बूंद समझकर प्यासी किरण रोज आती है आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। *****

  • 17th Jun 2026

    जो आग दिल में है!

    हर एक लहज़ा यही आरज़ू यही हसरत,जो आग दिल में है वो शेर में भी ढल जाए। उबैदुल्लाह अलीम

  • 17th Jun 2026

    तन्हाइयों में जल जाए!

    मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ,जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए। उबैदुल्लाह अलीम

  • 17th Jun 2026

    कुछ तो लोग कहेंगे!

    मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मेरे स्वर में प्रस्तुत है यह गीत – कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना।फ़िल्म- अमर प्रेम का संजीदा गीतगीतकार- आनंद बक्षीसंगीतकार- राहुल देव बर्मन गायक- किशोर कुमारप्रस्तुति- श्रीकृष्ण शर्मा आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद। *****

  • 17th Jun 2026

    कड़वा सत्य!

    आज मैं श्रेष्ठ हिंदी साहित्यकार स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की रचना शेयर कर रहा हूँ। विष्णु प्रभाकर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर जी की यह कविता – एक लंबी मेजदूसरी लंबी मेजतीसरी लंबी मेजदीवारों से सटी पारदर्शी शीशेवाली अलमारियाँमेजों के दोनों ओर बैठे हैं…

  • 16th Jun 2026

    कहाँ रास्ता बदल जाए!

    मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा,कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए| उबैदुल्लाह अलीम

  • 16th Jun 2026

    अज़ीज़ इतना ही रक्खो!

    अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए,अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए| उबैदुल्लाह अलीम

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