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जल-थल नहीं होते!
शाइस्तगी-ए-ग़म के सबब आँखों के सहरा, नमनाक तो हो जाते हैं जल-थल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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कभी हल नहीं होते!
कुछ मुश्किलें ऐसी हैं कि आसाँ नहीं होतीं, कुछ ऐसे मुअम्मे हैं कभी हल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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करिश्मे भी अजब हैं!
अंदर की फ़ज़ाओं के करिश्मे भी अजब हैं, मेंह टूट के बरसे भी तो बादल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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मगर कल नहीं होते!
ऐसा है कि सब ख़्वाब मुसलसल नहीं होते, जो आज तो होते हैं मगर कल नहीं होते| अहमद फ़राज़
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आँखें बोलेंगी!
आज एक बार फिर से मैं अपनी तरह के अनूठे हिन्दी कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता – जीभ की ज़रूरत नहीं है क्योंकि कहकर या…
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इतने बे-ख़बर भी नहीं
निगाह-ए-शौक़ सर-ए-बज़्म बे-हिजाब न हो, वो बे-ख़बर ही सही इतने बे-ख़बर भी नहीं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तेरी रहगुज़र भी नहीं!
न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ, इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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इक नज़र भी नहीं!
बरस रही है हरीम-ए-हवस में दौलत-ए-हुस्न, गदा-ए-इश्क़ के कासे में इक नज़र भी नहीं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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इस क़दर भी नहीं!
वफ़ा-ए-वादा नहीं वादा-ए-दिगर भी नहीं, वो मुझसे रूठे तो थे लेकिन इस क़दर भी नहीं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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हम-कलाम कब से है!
कहाँ गए शब-ए-फ़ुर्क़त के जागने वाले, सितारा-ए-सहरी हम-कलाम कब से है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़