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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 7th May 2023

    पांच सीढ़ियाँ!

    लीजिए आज एक बार फिर से प्रस्तुत है हिन्दी के एक श्रेष्ठ व्यंग्यकार और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता|  कविता काफी पुरानी है और इसमें अशोक जी ने अपने प्रिय पात्र ‘बौड़म जी’ के माध्यम से स्वतंत्रता के बाद के पाँच दशकों के बारे में कहा है| चक्रधर जी की…

  • 6th May 2023

    क़ानून समझाने लगे हैं

    वो सलीबों के क़रीब आए तो हमको,क़ायदे-क़ानून समझाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2023

    फूल कुम्हलाने लगे हैं!

    अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2023

    लोग चिल्लाने लगे हैं!

    कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं,गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं| दुष्यंत कुमार

  • 6th May 2023

    कहीं चला भी गया!

    चलो ‘मुनीर’ चलें अब यहाँ रहें भी तो क्या, वो संग-दिल तो यहाँ से कहीं चला भी गया|    मुनीर नियाज़ी

  • 6th May 2023

    लहू रुला भी गया!

    हवा थी गहरी घटा थी हिना की ख़ुशबू थी, ये एक रात का क़िस्सा लहू रुला भी गया| मुनीर नियाज़ी

  • 6th May 2023

    ख़ून आ भी गया!

    न आया कोई लब-ए-बाम शाम ढलने लगी, वुफ़ूर-ए-शौक़ से आँखों में ख़ून आ भी गया| मुनीर नियाज़ी

  • 6th May 2023

    जल उठी बिजली!

    ग़ज़ब हुआ जो अँधेरे में जल उठी बिजली, बदन किसी का तिलिस्मात कुछ दिखा भी गया| मुनीर नियाज़ी

  • 6th May 2023

    वक्त!

    एक बार फिर से मैं आज हिन्दी के एक श्रेष्ठ नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का  एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|  मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत  – वक्त कभी माटी का, वक्त कभी सोने का पर…

  • 5th May 2023

    नींद से जगा भी गया!

    उठा तो जा भी चुका था अजीब मेहमाँ था, सदाएँ दे के मुझे नींद से जगा भी गया| मुनीर नियाज़ी

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