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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th May 2023

    बीमार किया जाना है!

    हम तसव्वुर में बना बैठे हैं इक चारा-गर, ख़ुद को जिसके लिए बीमार किया जाना है| राजेश रेड्डी

  • 8th May 2023

    दीदार किया जाना है!

    शौक़ की हद को अभी पार किया जाना है, आईने में तिरा दीदार किया जाना है| राजेश रेड्डी

  • 8th May 2023

    हम न होंगे!

    आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| वाजपेयी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता  – हम न होंगे-जीवन और उसका अनन्त स्पन्दन,कड़ी धूप में घास की हरीतिमा,प्रेम…

  • 7th May 2023

    इक सनम का हाथ चले

    भुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ ‘मजरूह’, बग़ल में हम भी लिए इक सनम का हाथ चले| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2023

    जैसे काएनात चले!

    क़तार-ए-शीशा है या कारवान-ए-हम-सफ़राँ, ख़िराम-ए-जाम है या जैसे काएनात चले| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2023

    रहज़नों के हाथ चले!

    बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द-ए-वफ़ा, अगरचे लुटते रहे रहज़नों के हाथ चले| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2023

    सियाह रात चले!

    सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़, जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2023

    कहीं से बात चले!

    हमारे लब न सही वो दहान-ए-ज़ख़्म सही, वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2023

    दिन चले न रात चले!

    दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं, अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले| मजरूह सुल्तानपुरी

  • 7th May 2023

    जो घर को आग लगाए

    जला के मिशअल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले, जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले| मजरूह सुल्तानपुरी

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