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बीमार किया जाना है!
हम तसव्वुर में बना बैठे हैं इक चारा-गर, ख़ुद को जिसके लिए बीमार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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दीदार किया जाना है!
शौक़ की हद को अभी पार किया जाना है, आईने में तिरा दीदार किया जाना है| राजेश रेड्डी
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हम न होंगे!
आज एक बार फिर मैं आधुनिक हिन्दी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| वाजपेयी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता – हम न होंगे-जीवन और उसका अनन्त स्पन्दन,कड़ी धूप में घास की हरीतिमा,प्रेम…
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इक सनम का हाथ चले
भुला ही बैठे जब अहल-ए-हरम तो ऐ ‘मजरूह’, बग़ल में हम भी लिए इक सनम का हाथ चले| मजरूह सुल्तानपुरी
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जैसे काएनात चले!
क़तार-ए-शीशा है या कारवान-ए-हम-सफ़राँ, ख़िराम-ए-जाम है या जैसे काएनात चले| मजरूह सुल्तानपुरी
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रहज़नों के हाथ चले!
बचा के लाए हम ऐ यार फिर भी नक़्द-ए-वफ़ा, अगरचे लुटते रहे रहज़नों के हाथ चले| मजरूह सुल्तानपुरी
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सियाह रात चले!
सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग़, जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले| मजरूह सुल्तानपुरी
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कहीं से बात चले!
हमारे लब न सही वो दहान-ए-ज़ख़्म सही, वहीं पहुँचती है यारो कहीं से बात चले| मजरूह सुल्तानपुरी
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दिन चले न रात चले!
दयार-ए-शाम नहीं मंज़िल-ए-सहर भी नहीं, अजब नगर है यहाँ दिन चले न रात चले| मजरूह सुल्तानपुरी
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जो घर को आग लगाए
जला के मिशअल-ए-जाँ हम जुनूँ-सिफ़ात चले, जो घर को आग लगाए हमारे साथ चले| मजरूह सुल्तानपुरी