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कोई हिला भी नहीं!
वो चीख़ उभरी बड़ी देर गूँजी डूब गई, हर एक सुनता था लेकिन कोई हिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
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अब गिला भी नहीं!
कभी जो तल्ख़-कलामी थी वो भी ख़त्म हुई, कभी गिला था हमें उनसे अब गिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
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कभी मिला भी नहीं!
कभी तो बात की उसने कभी रहा ख़ामोश, कभी तो हँस के मिला और कभी मिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
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कुछ हुआ भी नहीं!
कभी ये लगता है अब ख़त्म हो गया सब कुछ, कभी ये लगता है अब तक तो कुछ हुआ भी नहीं| जावेद अख़्तर
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मिरा ख़ुदा भी नहीं!
मैं कब से कितना हूँ तन्हा तुझे पता भी नहीं, तिरा तो कोई ख़ुदा है मिरा ख़ुदा भी नहीं| जावेद अख़्तर
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मातृभूमि!
आज एक बार मैं फिर से प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार और राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत कविताएं लिखने वाले स्वर्गीय सोहनलाल द्विवेदी जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ| द्विवेदी जी की गांधीजी से संबंधित और स्वाधीनता संग्राम से जुड़ी कुछ कविताएं बहुत प्रसिद्ध हैं| द्विवेदी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|…
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जहाँ जाएँ जिधर जाएँ!
कोई तो ऐसा घर होता जहाँ से प्यार मिल जाता, वही बेगाने चेहरे हैं जहाँ जाएँ जिधर जाएँ| साहिर लुधियानवी
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ग़म है जिधर जाएँ!
तिरी दुनिया में जीने से तो बेहतर है कि मर जाएँ, वही आँसू वही आहें वही ग़म है जिधर जाएँ| साहिर लुधियानवी
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ख़ता साथ लिए जा!
हम जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाएँगे तन्हा, जो तुझ से हुई हो वो ख़ता साथ लिए जा| साहिर लुधियानवी