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गवारा ही न हो!
ज़िंदगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझको, दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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अश्कों की लकीर!
कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर, सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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तू ने पुकारा ही न हो!
दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी, चौंक उठता हूँ कहीं तू ने पुकारा ही न हो| जाँ निसार अख़्तर
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खिलते फूल मिलाप के
ये चली है कैसी हवा कि अब नहीं खिलते फूल मिलाप के, कभी दौर-ए-फ़स्ल-ए-बहार था तुम्हें याद हो कि न याद हो| अर्श मलसियानी
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याद हो कि न याद हो!
कभी हम में तुम में भी प्यार था तुम्हें याद हो कि न याद हो, न किसी के दिल में ग़ुबार था तुम्हें याद हो कि न याद हो| अर्श मलसियानी
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उषस् (तीन)!
आज मैं भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय नरेश मेहता जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| सुबह के सुंदर चित्र चित्र प्रस्तुत करते हुए उन्होंने एक ही शीर्षक से कुछ कविताएं लिखी थीं, उनमें से एक आज प्रस्तुत है| उनकी कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत…
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माहौल के ख़ूनी मंज़र
वो मर्द नहीं जो डर जाए माहौल के ख़ूनी मंज़र से, इस हाल में जीना लाज़िम है जिस हाल में जीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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सीना मुश्किल है!
करने को रफ़ू कर ही लेंगे दुनिया वाले सब ज़ख़्म अपने, जो ज़ख़्म दिल-ए-इंसाँ पे लगा उस ज़ख़्म का सीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी
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क़रीना मुश्किल है!
वो शोला नहीं जो बुझ जाए आँधी के एक ही झोंके से, बुझने का सलीक़ा आसाँ है जलने का क़रीना मुश्किल है| अर्श मलसियानी