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डूबने वालों ने भी!
मिरा तो सिर्फ़ भँवर तक सफ़ीना पहुँचा है, तुझे तो डूबने वालों ने भी पुकारा नहीं| क़तील शिफ़ाई
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कभी पसारा नहीं!
ये इल्तिफ़ात* की भीक अपने पास रहने दे, तिरे फ़क़ीर ने दामन कभी पसारा नहीं| *रहम क़तील शिफ़ाई
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आए क्या घटा के सिवा
तुम्हारे ज़िक्र से याद आए क्या घटा के सिवा, हमारे पास कोई और इस्तिआरा नहीं| क़तील शिफ़ाई
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प्रेम के प्रति!
आज मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| निराला जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की यह कविता – चिर-समाधि में अचिर-प्रकृति जब,तुम अनादि तब केवल तम;अपने ही सुख-इंगित से…
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ज़माने का है!
ख़ुशी से कौन भुलाता है अपने प्यारों को, क़ुसूर इसमें ज़माने का है तुम्हारा नहीं| क़तील शिफ़ाई
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बढ़ा दूँ कुछ और भी!
तुम आ सको तो शब को बढ़ा दूँ कुछ और भी, अपने कहे में सुब्ह का तारा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई
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वो पहली सी रौशनी!
शम्ओं‘ में अब नहीं है वो पहली सी रौशनी, क्या वाक़ई वो अंजुमन-आरा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई
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सहारा है इन दिनों!
ये दिल ज़रा सा दिल तिरी यादों में खो गया, ज़र्रे को आँधियों का सहारा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई
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दरिया की मौज मौज!
हर सैल-ए-अश्क साहिल-ए-तस्कीं है आज-कल, दरिया की मौज मौज किनारा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई