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वफ़ा के बग़ैर भी!
बरसों से इस मकान में रहते हैं चंद लोग, इक दूसरे के साथ वफ़ा के बग़ैर भी| मुनव्वर राना
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दुआ के बग़ैर भी!
साँसों का कारोबार बदन की ज़रूरतें, सब कुछ तो चल रहा है दुआ के बग़ैर भी| मुनव्वर राना
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दवा के बग़ैर भी!
अच्छी से अच्छी आब-ओ-हवा के बग़ैर भी, ज़िंदा हैं कितने लोग दवा के बग़ैर भी| मुनव्वर राना
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दिलों में फ़ासले!
बड़ी मुश्किल से आते हैं समझ में लखनऊ वाले, दिलों में फ़ासले लब पर मगर आदाब रहता है| मुनव्वर राना
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इन्ही लोगों के दम से है
हमारी हर परेशानी इन्ही लोगों के दम से है, हमारे साथ ये जो हल्क़ा-ए-अहबाब रहता है| मुनव्वर राना
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ये सोने की दुकानें हैं!
ये बाज़ार-ए-हवस है तुम यहाँ कैसे चले आए, ये सोने की दुकानें हैं यहाँ तेज़ाब रहता है| मुनव्वर राना
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यूनिफार्म में बच्चे!
भले लगते हैं स्कूलों की यूनिफार्म में बच्चे, कँवल के फूल से जैसे भरा तालाब रहता है| मुनव्वर राना
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सैलाब रहता है|
हज़ारों बस्तियाँ आ जाएँगी तूफ़ान की ज़द में, मिरी आँखों में अब आँसू नहीं सैलाब रहता है| मुनव्वर राना
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शरण्य!
आज एक बार फिर से मैं आधुनिक हिन्दी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| वाजपेयी जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता – शरण खोजते हुएफिर हम तुम्हारे पास ही आएँगे। नक्षत्रों में नहीं मिलेगा…
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तसव्वुर में हमेशा!
मुक़द्दर में लिखा कर लाए हैं हम बोरिया लेकिन, तसव्वुर में हमेशा रेशम-ओ-कम-ख़्वाब रहता है| मुनव्वर राना