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चराग़ राह में जल गए!
मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए, तिरा हाथ हाथ में आ गया कि चराग़ राह में जल गए| मजरूह सुल्तानपुरी
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उट्ठा है तिरी बज़्म से!
वही ‘मजरूह’ वही शाइर-ए-आवारा-मिज़ाज, कोई उट्ठा है तिरी बज़्म से दिल-गीर न देख| मजरूह सुल्तानपुरी
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दिल की सदा हूँ नादाँ!
कुछ भी हूँ फिर भी दुखे दिल की सदा हूँ नादाँ, मेरी बातों को समझ तल्ख़ी-ए-तक़रीर न देख| मजरूह सुल्तानपुरी
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ये उजाला ये सुकूँ!
ये ज़रा दूर पे मंज़िल ये उजाला ये सुकूँ, ख़्वाब को देख अभी ख़्वाब की ताबीर न देख| मजरूह सुल्तानपुरी
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मेरी तस्वीर न देख!
हादसे और भी गुज़रे तिरी उल्फ़त के सिवा, हाँ मुझे देख मुझे, अब मेरी तस्वीर न देख| मजरूह सुल्तानपुरी
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जीने की तदबीर न देख
आह-ए-जाँ-सोज़ की महरूमी-ए-तासीर न देख, हो ही जाएगी कोई जीने की तदबीर न देख| मजरूह सुल्तानपुरी
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अजब तमाशा – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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हम बे-क़ुसूर लोग भी!
हम बे-क़ुसूर लोग भी दिलचस्प लोग हैं, शर्मिंदा हो रहे हैं ख़ता के बग़ैर भी| मुनव्वर राना