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परदों के नाटक!
आज एक बार फिर से मैं, किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी कविताओं और अनूठी प्रस्तुति शैली से धूम मचाने वाले श्रेष्ठ कवि जी का एक सुंदर गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| सरोज जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी का…
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जीने और मरने का!
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का, उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब
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ख़त हमसे लिखवाए!
मगर लिखवाए कोई उसको ख़त तो हम से लिखवाए, हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर क़लम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब
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पेच-ओ-ख़म निकले!
भरम खुल जाए ज़ालिम तेरे क़ामत की दराज़ी का, अगर इस तुर्रा-ए-पुर-पेच-ओ-ख़म का पेच-ओ-ख़म निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब
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बहुत बे-आबरू होकर
निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन, बहुत बे-आबरू होकर तिरे कूचे से हम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब
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यूँ दम-ब-दम निकले!
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर, वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब
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ख़्वाहिश पे दम निकले!
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले| मिर्ज़ा ग़ालिब
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जीवन के पतझड़ में!
किसी जमाने में हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी कविताओं और अनूठी प्रस्तुति शैली से धूम मचाने वाले श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय बलबीरसिंह ‘रंग’ जी का एक सुंदर गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंग जी की कुछ रचनाएँ मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीरसिंह ‘रंग’ जी का यह गीत –…